ब्रह्मलीन सतगुरु श्री श्री 108 श्री राज माताजी महाराज की 8 संतान में सबसे छोटे पुत्र के रूप में जिस दिव्य प्रतिभा ने जन्म लिया वह घर का नाम बिट्टू एवं समाज का नाम जिनका राजेश वोहरा हुआ 9 दिसंबर सन 1964 में इनका श्री राज माताजी महाराज एवं लाल दरयाई लाल वोहरा जी के माध्यम से इस संसार में अवतरण हुआ।
इसी संस्था से जुड़े हुए एक महापुरुष ने कहा है कि सद्गुरु श्री राजमाता जी महाराज की जब भक्ति निरंतर बढ़ती चली गई तो एक बार मां भगवती नहीं सद्गुरु श्री राजमाता जी से कहा आखिर तुम क्या चाहती हो?तो श्री राजमाता जी महाराज ने कहा मैं कुछ भी सांसारिक पदार्थ नहीं चाहती। मैं सिर्फ भक्ति रूप प्रसाद की कामना करती हूं,तो मां अष्टभुजी रानी ने कहा मैं अब तेरे को प्रसाद देने के लिए जा रहे हूं।इस वायदे के रूप में 9 दिसंबर 1964 को एक विलक्षण प्रतिभा जिसका जन्म जन्मांतरों से आध्यात्मिक ज्ञान, आध्यात्मिक विषयों में रुचि परमात्मा के प्रति लग्न एवं हमेशा संसार के एक-एक प्राणी में भगवत दर्शन का भाव रहा।इस विलक्षण प्रतिमा को मां भगवती ने श्री राजमाता जी को प्रसाद के रूप में एक उपहार दिया जो श्री राजमाता जी के आठवीं संतान राजेश वोहरा के रूप में उनके घर में उत्पन्न हुई की साक्षात मां भगवती का प्रसाद माना गया है।
बाल्यकाल में जब स्वामी राजेश्वरानंद उर्फ राजेश वोहरा जी के पिता लाला दरयाई लाल जी ने इस बालक की कुंडली ब्राह्मणों से बनवाई तो ब्राह्मणों ने कहा यह विलक्षण प्रतिभा का धनी होगा। दार्शनिक,आध्यात्मिक ज्ञान में इसकी विशेष रुचि होगी यह लोगों का सबसे बड़ा सलाहकार सिद्ध होगा बड़े-बड़े विद्वान इस विलक्षण प्रतिभा से सलाह लेने के लिए इसके दरबार में पहुंचेंगे।यह संसार में सेवा कार्यों का पर्यायवाची शब्द बनेगा और यह संसार को उज्जवल प्रकाश देगा। यह स्वयं में एक विश्वविद्यालय होगा जो लोगों को भक्ति,संगीत,सेवा,सत्संग का आध्यात्मिक ज्ञान देगा और उनको संसार में सेवा करने के लिए प्रेरित करके दसों दिशाओं में मार्गदर्शक बनेगा।आपका यह पुत्र देश ही नहीं विदेशों बल्कि विश्वभर में आपका नाम रोशन करेगा।
यही स्पष्ट दिखाई देने लगा बाल काल में ही स्वामी राजेश्वरानंद जी यानी राजेश वोहरा,बिट्टू कश्मीरी गेट कटरा मोहसिन खान में छोटे-छोटे बच्चों को इकट्ठा करके जन्माष्टमी मनाने लगे।थोड़ा रेत,थोड़े छोटे-छोटे खिलौने लेकर जन्माष्टमी सजाते थे फिर जब रामलीला के दिन आते थे तो गली के बच्चों को राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न और जब देखा कि कोई बच्चा भी रावण बनने क्या तैयार नहीं है तो स्वामी राजेश्वरानंद खुद ही रावण बनकर इस रामलीला का मार्गदर्शन करते रहे और जब स्वामी राजेश्वरानंद यानी बालक राजेश वोहरा ने कश्मीरी गेट छोड़ा तो उसके बाद वह रामलीला कभी भी नहीं हुई। दिल्ली के मेयर रहे जत्थेदार अवतार सिंह जी जोकि की काफी समय से रामलीला कर रहे हैं वह भी स्वामी राजेश्वरानंद जी को अपने द्वारा की हुई रामलीला का प्रेरणा स्त्रोत मानते हैं।
कहा जाता है पूत के भाव पालने में दिखाई देने शुरू हो जाते हैं इस बात को चरितार्थ करते हुए एक रात को छोटा सा बालक राजेश वोहरा अपनी मां श्री राज माता जी के साथ रात को सो रहा था एकाएक रात को 2:00 बजे जगा और अपनी मां को जगा कर कहा "मां उठो मुझे बेचैनी हो रही है मुझे डर लग रहा है मुझे समझ नहीं आ रही क्या हम सब एक दिन मर जाएंगे हमारे को लकड़ियों में जला दिया जाएगा,मां मेरे को बहुत ज्यादा डर लग रहा है।" मां तो उस छोटी सी लौ में छिपे हुए सूर्य के तेज को देख रही थी उसने बड़े प्यार से सिर पर हाथ फेरा और कहा " सो जा बेटा धीरे-धीरे सब समझ आ जाएगी आराम कर!"
सदगुरू श्री राजमाता जी अपने इस बेटे को संतो महात्माओं की अनेक प्रेरणादायक कथाएं सुनाती रहती थी जिसपर बालक राजेश वोहरा, बिट्टू अपनी जिज्ञासाएं मां के समक्ष प्रकट करते थे। एक दिन माता जी ने बालक राजेश वोहरा को गुरु नानक देव की एक कथा सुनाई जिसमें नानकदेव जी के पिता ने उन्हें काम धंधा करने के लिए कुछ पैसे दिए लेकिन नानकदेव जी को एक संतो की टोली मिली और नानकदेव जी ने सोचा इससे सच्ची कमाई क्या होगी कि संतो को भोजन करवाया जाए।अब सांसारिक और संतो में यही अंतर होता है कि सांसारिक लोग कथा सुनते हैं लेकिन संत वृत्ति के लोग उसको अपने जीवन में उतारते हैं।
एक घटना:~छोटा सा बालक राजेश वोहरा कश्मीरी गेट दिल्ली के हैप्पी स्कूल में सातवीं क्लास में पढ़ते थे, सामाजिक ज्ञान की एक पुस्तिका चाहिए थी मां श्री राजमाता जी ने पैसे दिए की जा बेटा में पुस्तक खरीद लेना।उन्हीं दिनों की बात है कश्मीरी गेट में अंतरराष्ट्रीय बस अड्डा का निर्माण हो रहा था राजेश वोहरा अपने घर से पुस्तक खरीदने के पैसे जेब में लेकर जमुना की तरफ जा रहे थे क्योंकि वह घंटों जमुना के किनारे पर बैठकर विचार अनेक संकल्प विकल्प अनेक प्रकार के भावनाएं आध्यात्मिक ज्ञान दार्शनिक रूप से वहां पर बैठे रहते थे।जब घर से यमुना किनारे पर जाने के लिए बस अड्डे के रास्ते से निकले तो एक बुजुर्ग आदमी रो रहा था तो इस छोटे से बालक राजेश वोहरा ने बुजुर्ग आदमी से पूछा आप क्यों रो रहे हैं?तो उसने बताया कि मेरा बेटा खो गया है अब यह राजेश् वोहरा उस बुजुर्ग आदमी के साथ इधर-उधर उसके बेटे को खोजने लगा,लेकिन बेटा नहीं मिला तो इनको इस समय अपनी मां द्वारा सुनाई हुई गुरु नानक देव की कथा याद आई कि उन्होंने सच्ची कमाई की थी। अतः राजेश वोहरा के मन में आया कि सच्ची कमाई यही हैं कि इस बुजुर्ग की सेवा! उनकी जेब में जो पैसे थे एक गाइड को खरीदने के लिए उस पैसे को उसे बुजुर्ग को दे दिए कि तुम इस पैसों से टिकट लेकर अपने घर चले जाओ और स्वयं उस लड़के को खोजने लगे।थोड़ी देर बाद देखा कि वह बुजुर्ग आदमी एक लड़का और एक पुलिस वाला खड़े हैं तो यही बालक खुश होकर उसे आदमी के पास पहुंचा और बोला:~ आपका बेटा मिल गया है।लेकिन वह धोखेबाज इंसान था जो पुलिस वालों के साथ मिलकर बेटे खोने का धोखा कर रहा था।और उसने इस बालक को झिड़ककर कहा क्या है तू कौन है?बच्चे के हृदय पर थोड़ी सी चोट तो लगी लेकिन वह अपने स्वभाव को नहीं बदल सका और चुपचाप मुस्कुराता हूं अपने घर की ओर आ गया यह सेवा की सत्संग की बाल सुलभ क्रीड़ा साधारण नहीं थी यह तो आगे चलकर बहुत बड़ा पर्वत सिद्ध होने वाली थी।
धीरे धीरे युवावस्था को प्राप्त हुआ तो 7मई 1985 को परिवार की मर्जी से श्री हंसराज कौड़ा एवं संतोष कौड़ा की पुत्री सुनीता से राजेश वोहरा जी का विवाह सम्पन्न हुआ।
इस दौरान परिवार के पालन हेतु कार किराए पर, कभी परचून की दुकान कभी वीडियो लाइब्रेरी ओर इन्हीं व्यवसायिक कार्यों में निरंतर उन्नति करते हुए पूरी रुचि ओर विकास की राह पर ट्रेवल एजेंसी का काम करने लगे।अपनी व्यवसायिक कार्यों के साथ साथ राजेश वोहरा जी सदगुरु श्री राजमाता जी महाराज द्वारा समाज कल्याण, धार्मिक अनुष्ठान एवं धार्मिक यात्राओं में तथा श्री राजमाता झंडेवाला मंदिर के कार्यों में हाथ बटाने लगे थे और संगतो भक्तों में राजेश वोहरा जी द्वारा किए गए सहयोग कार्यों, भजन प्रस्तुति का विशेष आकर्षण बनने लगा।काम धंधा, संस्थान के कार्यों के मध्य राजेश वोहरा एवं सुनीता कौड़ा जो विवाह उपरांत पूजा वोहरा के नाम से अपने पतिदेव के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सांसारिक धर्म में आगे बढ़ रही थी इन दोनों के माध्यम से 1987 एक बालक एक 1990 एक बालिका जिनमें पुत्र राम वोहरा एवं पुत्री माला वोहरा ने जन्म लिया।
ईश्वर पर भरोसा रखो और साहस के साथ अपने मार्ग पर आगे बढ़ो।
मानवता की सेवा दयालुता और विनम्रता के साथ करें।
सच्ची भक्ति हृदय और मन को शुद्ध करती है।